डॉ. अवनीश राही की ‘मैं भूख हूँ’ ने साहित्य में उठाया बड़ा सवाल, साइना नेहवाल ने किया लोकार्पण

71 काव्य-रचनाओं की त्रि-आयामी युग–काव्य–संहिता को विश्व कीर्तिमान की मान्यता; राही को मिला वैश्विक साहित्य नवाचार सम्मान

नई दिल्ली,25 अगस्त: भूख को यदि केवल पेट की आवश्यकता मान लिया जाए तो उसका अर्थ सीमित हो जाता है। लेकिन जब वही भूख रोटी से आगे बढ़कर शिक्षा, न्याय, सम्मान, अवसर और समानता का प्रश्न बन जाए, तब वह केवल सामाजिक समस्या नहीं रहती—वह साहित्य का विषय भी बन जाती है। डॉ. अवनीश राही की “मैं भूख हूँ : एक युग–काव्य–संहिता” (रोटी से राष्ट्र तक की वेदना) इसी व्यापक दृष्टि के साथ सामने आई है। नई दिल्ली में 22 अगस्त को आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक शब्दोत्सव में इस कृति का भव्य लोकार्पण पद्म भूषण एवं विश्वप्रसिद्ध बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने किया। इसी अवसर पर डॉ. राही को “वैश्विक साहित्य नवाचार सम्मान” से सम्मानित किया गया।

काइट्सक्राफ्ट प्रोडक्शंस एलएलपी के तत्वावधान में आयोजित समारोह में साइना नेहवाल ने डॉ. राही को अंगवस्त्र, प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। ‘मैं भूख हूँ’ से जुड़े विश्व कीर्तिमान पर बधाई देते हुए उन्होंने कृति को साहित्य की पारंपरिक प्रस्तुति से आगे ले जाने वाला अभिनव प्रयोग बताया। उनके अनुसार यह साहित्य को पठनीय, श्रवणीय और दर्शनीय रूप में अनुभव करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

साइना नेहवाल की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक अलग सांस्कृतिक अर्थ भी दिया। खेल के मैदान में भारत को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाली खिलाड़ी के हाथों ऐसी साहित्यिक कृति का लोकार्पण हुआ, जिसका केंद्र समाज के उन प्रश्नों पर है, जो मनुष्य के जीवन की बुनियादी जरूरतों और उसके अधिकारों से जुड़े हैं। यह उपलब्धि और संवेदना का ऐसा संगम रहा, जिसमें खेल और साहित्य अपनी-अपनी सीमाओं से निकलकर एक साझा मानवीय सरोकार पर दिखाई दिए।

डॉ. अवनीश राही की ‘मैं भूख हूँ’ ने साहित्य में उठाया बड़ा सवाल, साइना नेहवाल ने किया लोकार्पण

“मैं भूख हूँ” की विशिष्टता उसके शीर्षक में जितनी दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक उसकी वैचारिक संरचना में है। 71 काव्य-रचनाओं वाली इस युग–काव्य–संहिता में ‘भूख’ को केवल विषय के रूप में नहीं, बल्कि महा-नायिका के रूप में देखा गया है।

यह भूख रोटी की है, लेकिन केवल रोटी की नहीं। यह गरीबी की भूख है, बेरोजगारी की भूख है, शिक्षा की भूख है, न्याय की भूख है, सम्मान की भूख है, अवसर की भूख है और समानता की भूख है। यहीं से कृति की यात्रा व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र तक जाती है। “रोटी से राष्ट्र तक की वेदना” इसीलिए केवल उपशीर्षक नहीं, बल्कि पूरे ग्रंथ की वैचारिक दिशा को समझने का सूत्र बन जाती है।

डॉ. राही के लिए गीत केवल भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम नहीं है। वह अपने समय की पीड़ा, विसंगतियों और प्रश्नों को स्वर देने का माध्यम भी है। इसी दृष्टि को वह एक पंक्ति में व्यक्त करते हैं—

“जहाँ भूख है—वहाँ मैं हूँ,

और जहाँ मैं हूँ—वहाँ सुलगते प्रश्न हैं।”

इस कथन में “मैं भूख हूँ” की रचनात्मक चेतना दिखाई देती है। यहाँ भूख आँकड़ा नहीं है; वह अनुभव है। वह केवल आवश्यकता नहीं; वह आकांक्षा है। और अंततः वह ऐसा प्रश्न है, जो समाज से उत्तर चाहता है।

कृति की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता इसका त्रि-आयामी स्वरूप है। 71 काव्य-रचनाओं के साथ QR कोड आधारित प्रस्तुति के माध्यम से पाठक रचनाओं को पढ़ने के साथ उन्हें सुन और देख भी सकता है। इस तरह साहित्य का अनुभव केवल मुद्रित पृष्ठ तक सीमित नहीं रहता। शब्द स्वर में बदलता है और स्वर दृश्य तक पहुँचता है। इसी अभिनव त्रि-आयामी साहित्यिक प्रस्तुति के लिए “मैं भूख हूँ” को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज कर विश्व कीर्तिमान बनाया गया है।

हालाँकि इस कृति की सार्थकता केवल तकनीकी प्रयोग में नहीं है। तकनीक यहाँ माध्यम है; उसके पीछे साहित्य का मूल प्रश्न खड़ा है—मनुष्य और उसकी अधूरी जरूरतों का प्रश्न। यही कारण है कि “मैं भूख हूँ” को केवल एक रिकॉर्ड के रूप में देखना इसके साहित्यिक महत्व को सीमित करना होगा।

डॉ. अवनीश राही की चार दशकों से अधिक की साहित्यिक यात्रा से निकली यह कृति उनके गीत-सृजन, सामाजिक सरोकार और आधुनिक प्रस्तुति के बीच विकसित हुई रचनात्मक दृष्टि को सामने रखती है। अलीगढ़ की साहित्यिक और शैक्षिक भूमि इस यात्रा का महत्वपूर्ण आधार रही है। इसी सृजनभूमि से निकली कृति अब राष्ट्रीय साहित्यिक मंच तक पहुँची है। इसलिए इसका दिल्ली तक पहुँचना केवल एक पुस्तक का स्थान बदलना नहीं, बल्कि एक शहर की साहित्यिक परंपरा का व्यापक राष्ट्रीय संवाद से जुड़ना भी है।

डॉ. राही ने प्राप्त सम्मान अपने प्रथम गुरु एवं पिता महाकवि अमर सिंह राही को समर्पित किया। उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह बहुत भावुक क्षण है। मुझे साहित्य का पहला सबक अपने पिता से ही मिला है। मैं अपने पिता में ही अपने जीवन का सम्पूर्ण महाग्रंथ देखता हूँ। ‘मैं भूख हूँ’ के लिए मिले इस सम्मान में उन सभी साहित्यकारों, साहित्यप्रेमियों और पाठकों का भी योगदान है, जिनसे मुझे किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ सीखने को मिला है। यह सम्मान मेरे लिए खुशी के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी है और इससे मेरी जिम्मेदारी और बढ़ गई है।”

समारोह में डॉ. सुरभि सचिन धनवाला, रज़ा उर रहमान, मो. बदर उज जमान और आनंद प्रकाश सहित साहित्य, कला, शिक्षा, खेल और संस्कृति जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियाँ उपस्थित रहीं।

22 अगस्त का यह आयोजन इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय रहा कि एक ही मंच पर साहित्यिक लोकार्पण, रचनाकार का सम्मान, विश्व कीर्तिमान और साहित्य की आधुनिक प्रस्तुति—चारों आयाम एक साथ उपस्थित हुए। लेकिन इन सभी उपलब्धियों के बीच “मैं भूख हूँ” का सबसे बड़ा प्रश्न फिर भी वही है—क्या साहित्य भूख की आवाज बन सकता है?

इस कृति का उत्तर उसके कथ्य और संरचना में दिखाई देता है। वह भूख को केवल पेट तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे शिक्षा, न्याय, सम्मान, अवसर और समानता से जोड़ती है और फिर उसी प्रश्न को राष्ट्र के व्यापक संदर्भ में रखती है।

यही इसकी मूल यात्रा है—रोटी से राष्ट्र तक।

और शायद किसी भी साहित्यिक कृति की सबसे बड़ी शक्ति यही होती है कि वह पाठक को केवल उत्तर देकर नहीं, बल्कि ऐसा प्रश्न देकर विदा करे जो उसके भीतर देर तक जीवित रहे।

“मैं भूख हूँ” का प्रश्न भी ऐसा ही है।

भूख जहाँ है, साहित्य का प्रश्न वहीं से शुरू होता है।

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