परदादा लाइट के खंभे से गिरे थे, परपोते शिव मांडलिक ने वही खंभा जमीन पर उतार दिया

अहमदाबाद (गुजरात) [भारत], 5 अक्टूबर: साल 1956। गांव में लक्ष्मणभाई काम के लिए लाइट के खंभे पर चढ़े थे। न कमर में सेफ्टी बेल्ट थी, न नीचे कोई जाल। अचानक वे नीचे आ गिरे और फिर कभी नहीं उठे।

सत्तर साल बाद उनके परपोते, अहमदाबाद के 18 वर्षीय शिव मांडलिक (Shiv Mandlik), एक ही सवाल के पीछे पड़े हैं: जब ऊंचाई से गिरना रोका जा सकता है, तो मजदूर आज भी क्यों मर रहे हैं? बारहवीं के यह छात्र तीन मोर्चों पर लड़ रहे हैं: मजदूरों के बीच, मशीन से और नीति से। नतीजा है प्रोजेक्ट वेव, निर्माण श्रमिकों के लिए देश की सबसे बड़ी युवा-संचालित गैर-लाभकारी संस्था, जो 1.05 लाख से ज्यादा मजदूरों तक पहुंच चुकी है।

शिव मांडलिक ने परदादा को कभी देखा नहीं। करीब दस साल की उम्र में निर्माण व्यवसायी पिता नीरवभाई से यह किस्सा सुना। फिर एक दिन साइट पर एक मजदूर को उसी तरह गिरते हुए देखा। बकौल शिव मांडलिक, “सत्तर साल में इमारतें ऊंची होती गईं, मजदूर की हिफाजत वहीं की वहीं खड़ी रही।”

शिव मांडलिक ने जून 2021 में, स्कूल में पढ़ते हुए ही, प्रोजेक्ट वेव की नींव रखी। आज 6 शहरों और 3 देशों में 150 स्वयंसेवक हैं, जनसहयोग से 18 लाख रुपये जुट चुके हैं और संस्था को भारत सरकार तथा संयुक्त राष्ट्र से जुड़े सदस्यों का समर्थन प्राप्त है।

पहला सबक नाकामी से मिला। सुरक्षा किट (पीपीई) मिलने के बाद भी कई मजदूर उसे पहनते नहीं थे। शिव मांडलिक ने तरीका बदला, साइट पर सुरक्षा कार्यशालाएं लगाईं और नुक्कड़ नाटक खेले। 13,000 किट बंट चुकी हैं और सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल 12% से बढ़कर 75% हुआ है। वे कहते हैं, “किट देना आसान है, पहनवाना असली काम है।”

संस्था ने धातु की चादरों (टिन शेड) से बने 4,900 आश्रय खड़े किए और 500 असंगठित मजदूरों को ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत कराया, ताकि वे सरकारी बीमा और कल्याण योजनाओं से जुड़ सकें। माहवारी गरिमा अभियान में महिला श्रमिकों को 25,000 से ज्यादा सैनिटरी पैड बंटे और स्वच्छता अपनाने का अनुपात 9% से बढ़कर 86% हुआ।

सबसे निजी अध्याय लाइट का एक खंभा है। परदादा की जान ऊंचाई पर चढ़ने ने ली थी, इसलिए शिव मांडलिक ने चढ़ने की जरूरत ही खत्म कर दी। उन्होंने मॉड्यूलर आर्म पोल (एमएपी) ईजाद किया, एल्युमिनियम अलॉय और एफआरपी से बना लाइट का खंभा, जिसका ऊपरी हिस्सा जमीन पर लगा हैंडल घुमाते ही लाइट समेत नीचे आ जाता है। मजदूर ऊपर नहीं जाता, खंभा नीचे आता है। इसका पेटेंट स्वीकृत और प्रकाशित हो चुका है।

परदादा लाइट के खंभे से गिरे थे, परपोते शिव मांडलिक ने वही खंभा जमीन पर उतार दिया

मॉड्यूलाइट नाम से इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ और लाइट के ऐसे 120 से ज्यादा खंभे साइटों पर लग चुके हैं। बिक्री 38 लाख रुपये पहुंच चुकी है और ग्राहकों में बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट दिग्गज हैं।

दूसरा आविष्कार है अल्ट्रा-लाइटवेट मेटामटीरियल बेस फ्रेम, पारंपरिक भारी लोहे के ढांचे का हल्का विकल्प। शिव मांडलिक ने एनएसजीए-II एल्गोरिदम को 50 पीढ़ियों तक चलाकर मानक आई-बीम बेस फ्रेम के मुकाबले 18.9 गुना सेफ्टी फैक्टर हासिल किया। यह भी पेटेंटशुदा है और 1 करोड़ रुपये का लीज समझौता हो चुका है।

इन्हीं दो आविष्कारों ने शिव मांडलिक को इंडियन नेशनल साइंस एंड इंजीनियरिंग फेयर (इनसेफ) में 2,200 से ज्यादा प्रतिस्पर्धियों में पहला स्थान और राष्ट्रीय स्वर्ण पदक दिलाया। वे कहते हैं, “परदादा को मैं नहीं बचा सकता था। पर आज जो आदमी लाइट के खंभे पर चढ़ने वाला है, उसे शाम को घर लौटना चाहिए।”

जहां चढ़ना टाला नहीं जा सकता, वहां शिव मांडलिक का सह-स्थापित, 5,000 से ज्यादा डाउनलोड वाला समरक्षक ऐप फोन के सेंसर से गिरना भांपता है और 60 सेकंड में जवाब न मिलने पर साइट मैनेजर को लोकेशन समेत आपात सूचना भेज देता है।

शिव मांडलिक का तरीका हर बार एक है: समस्या नापो, हल बनाओ, फिर उसे एक साइट से पूरी व्यवस्था तक ले जाओ। इसीलिए प्रोजेक्ट वेव ने श्रमिक सुरक्षा नीति सख्त करने के लिए 8,000 से ज्यादा हस्ताक्षर भी जुटाए हैं।

शिव मांडलिक टेडएक्स के दो मंचों से बोल चुके हैं, लखनऊ में आमंत्रित वक्ता के तौर पर। व्याख्यान “द ब्लड इन अवर ब्लूप्रिंट्स” का सार है कि हर इमारत किसी कुर्बानी पर खड़ी है और मजदूर की सुरक्षा नींव के साथ दफन कर दी जाती है। यह पहचान और विरासत की बात भी है: बीता कल तय करता है कि हम क्या बनते हैं। शिव मांडलिक का बीता कल 1956 का वही लाइट का खंभा है।

शिव मांडलिक कहते हैं, “नक्शे में सीमेंट और सरिये का पूरा हिसाब होता है, मजदूर की जान का नहीं। मैं उस दिन के लिए काम कर रहा हूं जब कोई मजदूर गिरकर नहीं मरेगा और प्रोजेक्ट वेव की जरूरत ही नहीं रहेगी।”

जिन साइटों पर आज लाइट का खंभा खुद मजदूर के पास उतर आता है, वहां 1956 की वह कहानी रोज पलटी जा रही है। शिव मांडलिक की जिद है कि अगली इमारत बिना कुर्बानी के खड़ी हो।

(The article has been published through a syndicated feed. Except for the headline, the content has been published verbatim. Liability lies with original publisher.)

Inkhabar webdesk

Share
Published by Inkhabar webdesk

Recent Posts

Noisy knees? Culprit could be cartilage wear and tear

Berlin (dpa) - Does this sound familiar? Whenever you move your knee, it crunches like…

1 hour ago

Two in three people with hypertension are unaware of it, study shows

London (dpa) - The University of Oxford has warned of “stark” findings showing that two…

3 hours ago

Recipe: Frothy celeriac and potato soup with smoked salmon

Cologne (dpa) - "Souptember" might be over already, but the cosy season is only just…

4 hours ago

Don't sugar the medicine: No dessert with antibiotics, doctors advise

Los Angeles (dpa) - Alexander Fleming’s discovery of penicillin 98 years ago paved the way…

17 hours ago

'Lanterns' finale: The creators discuss John Stewart's Green Lantern

Careful: This story contains spoilers for HBO Max's "Lanterns." Los Angeles (tca/dpa) - From the…

18 hours ago

Tackling cancer-linked depression boosts survival chance, study shows

San Jose, California (dpa) - When a cancer diagnosis is confirmed, the impact can be…

19 hours ago