विक्रम आचार्य, जो खुद को ‘कर्मभूमि एडिनबर्ग और मर्मभूमि मिथिला’ का सेतु कहते हैं, ने इस दिशा में अदम्य लगन, सांस्कृतिक समर्पण और अथक संघर्ष से एक मिसाल कायम की है। उनका कहना है:
“जब मैं एडिनबर्ग की रॉयल माइल पर चलता हूँ तो मुझे अपनी मातृभूमि मिथिला के दार्शनिक आँगन दिखाई देते हैं। यह शहर ‘नॉर्थ का एथेंस’ है, और मिथिला ‘पूर्व का एथेंस’। दोनों ने दुनिया को तर्क, ज्ञान और कला दी है। मेरे प्रयासों का उद्देश्य इस विरासत को वैश्विक मंच पर स्थापित करना है – और मैं इसमें पूरी तरह सफल होता दिख रहा हूँ।”
आचार्य के अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि आज एडिनबर्ग के अंतरराष्ट्रीय कला मंचों पर मधुबनी चित्रकला की प्रदर्शनियाँ हो रही हैं, मैथिली भाषा के डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित हो रहे हैं, और तिरहुता लिपि का पुनरुद्धार एक जनआंदोलन बन चुका है। उन्होंने स्थानीय निकायों को मैथिली भाषा दिवस को मान्यता देने के लिए प्रेरित किया है – एक ऐसी उपलब्धि जो पिछले कभी किसी प्रवासी ने हासिल नहीं की थी।
यूके में रह रहे मैथिल युवा आज विक्रम आचार्य के नेतृत्व में अपनी जड़ों को नई ऊर्जा दे रहे हैं। कोजागरा, मधुश्रावणी, और आम के बागों की यादें अब एडिनबर्ग के घरों में सिर्जनशीलता के साथ जीवंत हो रही हैं। विक्रम आचार्य कहते हैं:
“हमने सात समंदर पार आकर अपनी अस्मिता नहीं बेची, बल्कि उसे और निखारा है। मेरा हर प्रयास, हर छोटी-बड़ी पहल इसी दिशा में रही है कि हमारी पाग (मिथिला का मुकुट) सिर्फ यादों तक सीमित न रहे, बल्कि वैश्विक गौरव बने।”
उल्लेखनीय है कि एडिनबर्ग – जिसे ‘उत्तरी एथेंस’ कहा जाता है – ने डेविड ह्यूम और एडम स्मिथ दिए, वहीं मिथिला ने याज्ञवल्क्य, गार्गी और मंडन मिश्र। विक्रम आचार्य के प्रयासों ने इन दोनों बौद्धिक परंपराओं के बीच एक जीवंत संवाद स्थापित किया है।
स्कॉटलैंड के सांस्कृतिक मंचों, प्रवासी भारतीय नेताओं और मैथिल समुदाय ने विक्रम आचार्य के महान प्रयासों की सराहना की है। उन्हें उम्मीद है कि उनके द्वारा बनाई गई यह मिसल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी।
आचार्य ने कहा:
“मिथिला का पुनरुत्थान इस बात का प्रमाण है कि जो समाज अपनी जड़ें नहीं भूलता, और जिसे समर्पित लोग जैसे मैं, रात-दिन मेहनत करें, उसे आधुनिकता के पंख अपने आप मिल जाते हैं। मेरे प्रयास रंग लाए हैं – और यह अभी शुरुआत है। जय मिथिला, जय मैथिली, जय जानकी।”
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